twitter
    Find out what I'm doing, Follow Me :)

Monday, 11 July 2011

"चला जा रहा हूं ..."

शायद इन्ही किरणों को खोजने निकला हूं ...
मै हार चुका हूँ ,
खुद से -
तुम सबसे ;
ज़िन्दगी का कुछ - 
नहीं पता मुझे ,
क्या कर रहा हूँ ?
बस किये जा रहा हूँ ,
ज़िन्दगी जिए जा रहा हूँ |
आशा की किरण ,
जगमगाती तो है कहीं
इन्ही किरणों को खोजने -
बस , चला जा रहा हूँ ;
प्रेम अब भी किये जा रहा हूँ | 
ईश्वर का विश्वास 
है अब भी मेरे साथ ,
और थोड़ा सा प्यार लेकर ,
आगे बड़े जा रहा हूँ |
चला जा रहा हूँ |
इसी आस में -
कि इक दिन शायद
मिलेंगी कुछ किरणे कहीं ,
जिन्हेंदूंगा बिखरा मैं, 
दुनिया में यहीं |
पर वो किरने भी तो -
हैं हम सबमे कहीं ;
बस देर है -
उन्हें खोजने की 
और सोचने की -
क्यों हारे हम ?
क्यों हारी उम्मीदें ?
कहाँ हैं वो किरने -
वो खुशियों के झरने- 
वो विश्व शांति के गहने- 
जिन्हें खोजने ,
मै चला जा रहा हूँ..
आगे बड़े जा रहा हूँ.. 
ज़िन्दगी जिए जा रहा हूं... |

- अक्षय ठाकुर "परब्रह्म" 

6 comments:

gourav said...

Out of the World...

Akshay Thakur "परब्रह्म" said...

Thanks Gourav Bhaiyya :-)

Shakti Singh said...

Nice Use of Pen & page Keep It On...life Is going On,Lots Of Practicals In life..So go Ahead..

neha said...

Amazing and very evocative.
Keep writing dear.

Akshay Thakur "परब्रह्म" said...

Thanks Shakti Bhaiyya and Neha :-)

Dhirendra said...

Wah ParBramha Wah...

Post a Comment

 
Vote for me now!