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Saturday, 12 February 2011

खुशियों का घर

स्वर
कभी निकलता भी नहीं मुख से
समझ के भी कोई क्या करे
ये आँखें 
आज भी सब कह देती हैं
कमबख्त 
पागल हूँ मै 
आंसू भी तो कम नहीं 
खुशियों का घर बनाने चले थे 
वापस वही समुन्दर
आंसुओं का सैलाब 
बहा ले गया
मेरी ज़िन्दगी के कुछ हसीं पन्ने |

अक्षय ठाकुर "परब्रह्म"

9 comments:

chandan said...

आँखे कितनी सच्ची होती हैं,
आखिर दिल की जुबां होती हैं.
आंसुओं से इनका पुराना रिश्ता है,
कभी गम तो कभी ख़ुशी की निशां होती हैं.

आशुतोष said...

Akshay Thakur"परब्रह्म"
जी अच्छी कविता...अच्छे भाव बधाइयाँ..
आप के ब्लॉग के नाम और मेरे ब्लॉग के नाम में काफी समानता है..
कभी समय निकल कर आयें..

http://ashu2aug.blogspot.com/

Akshay Thakur "परब्रह्म" said...

Thanks Ashu Bhai and Chandu..

Anonymous said...

Rainy Sharma says...Eyes are like windows
They reveal truth and lies...so wht is inside it expresses...bahut achche...jiyo

Shiva said...

now this one is wonderful,
expressive, and vivid

Akshay Thakur "परब्रह्म" said...

Thanks Rainy Ma'am and Shiva Bhai :-)

Sudha said...

Its the language of the eyes that is the most beautiful and most sincere, once understood... Very well written :-)

हरीश सिंह said...

भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की तरफ से आप, आपके परिवार तथा इष्टमित्रो को होली की हार्दिक शुभकामना. यह मंच आपका स्वागत करता है, आप अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

Anonymous said...

Good :)

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